वक्ताओं ने प्रेमचंद की साहित्यिक विरासत, सामाजिक सरोकार और वर्तमान समय में उनकी प्रासंगिकता पर रखे विचार
बेगूसराय, 2 अगस्त 2026। नेशनल पॉजिटिव न्यूज़
जनवादी लेखक संघ (जलेस) और जन संस्कृति मंच (जसम) की बेगूसराय जिला इकाइयों के संयुक्त तत्वावधान में सोमवार को जी.डी. कॉलेज स्थित दिनकर सभागार में हिंदी-उर्दू के महान साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद की जयंती पर एक सेमिनार का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का विषय “मौजूदा राजनीतिक-सांस्कृतिक परिदृश्य में प्रेमचंद” था। इस अवसर पर जनगीत, कहानी-पाठ और प्रेमचंद के साहित्य पर विस्तृत चर्चा की गई।
कार्यक्रम की अध्यक्षता जलेस के जिला अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र साह एवं जसम के जिला अध्यक्ष विजय कुमार सिन्हा ने संयुक्त रूप से की, जबकि संचालन जलेस के जिला सचिव राजेश कुमार ने किया। कार्यक्रम की शुरुआत अभिनंदन झा और देवेंद्र कुंवर द्वारा जनवादी गीतों की प्रस्तुति से हुई। प्रो. जिक्रुल्लाह खान ने जलेस, प्रलेस और जसम के राष्ट्रीय महासचिवों के संयुक्त घोषणा-पत्र का वाचन किया। इसके बाद दीपक सिन्हा और विजय कुमार सिन्हा ने प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी ‘मंदिर-मस्जिद’ का संयुक्त पाठ किया।
अपने अध्यक्षीय संबोधन में ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. राजेंद्र साह ने कहा कि प्रेमचंद के साहित्य में भारतीय गांव, किसानों और साझी सांस्कृतिक परंपरा का सबसे प्रामाणिक चित्रण मिलता है। जनवादी लेखक संघ के राज्य सचिव कुमार विनीताभ ने कहा कि प्रेमचंद यथार्थवादी और प्रगतिशील साहित्यकार थे, जिन्होंने अपने लेखन के माध्यम से सामंतवाद, साम्राज्यवाद और सामाजिक अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई। जन संस्कृति मंच के बिहार राज्य सचिव दीपक सिन्हा ने कहा कि प्रेमचंद ने किसानों, महिलाओं और दलितों के जीवन संघर्ष को अपनी रचनाओं का केंद्र बनाया। उन्होंने प्रेमचंद को “हिंदी का गोर्की” बताते हुए कहा कि उनकी चेतावनी आज भी प्रासंगिक है कि सांप्रदायिकता अक्सर संस्कृति का आवरण ओढ़कर समाज में प्रवेश करती है।
सेमिनार में डॉ. ललिता कुमारी, अनिल पतंग, दीनानाथ ‘सुमित्र’, उमेश कुंवर ‘कवि’, रवि रंजन, चैतन्य मित्र, चंदन वत्स, इम्तियाजुल हक ‘डब्लू’, संतोष राही, मुकेश कुमार सहित कई वक्ताओं ने अपने विचार रखे। वक्ताओं ने प्रेमचंद के साहित्य को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बताते हुए वर्तमान समय में उसकी प्रासंगिकता पर बल दिया।
कार्यक्रम का समापन तनु कुमार द्वारा दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल “धीरे-धीरे यहां का मौसम बदलने लगा है” की प्रस्तुति के साथ हुआ। अंत में कुमार विनीताभ ने पश्चिम बंगाल में राहुल सांकृत्यायन और सुकांत भट्टाचार्य तथा वाराणसी में कवि धूमिल की प्रतिमाओं को क्षतिग्रस्त किए जाने की घटना की निंदा का प्रस्ताव रखा, जिसे सर्वसम्मति से पारित किया गया। प्रलेस के जिला सचिव राजकिशोर सिंह ने धन्यवाद ज्ञापन किया।
कार्यक्रम में डॉ. चंद्रशेखर चौरसिया, अवध बिहारी, डॉ. अनिल कुमार, नरेंद्र कुमार सिंह, सुबेर आलम, उपेंद्र राम, चंदन कुमार, संतोष महतो, मिथिलेश कांति, फुलेना रजक, कृष्ण कुमार सिंह, ऐजेल आनंद, रोहन सिन्हा, संजीत कुमार श्रीवास्तव, गोविंद कुमार, पंकज कुमार सिंहा, शंभु प्रसाद सिंह, राजू सिंह, राम लगन ठाकुर सहित बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे।







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