बेगूसराय से भागलपुर, मथुरा और बनारस होते हुए जालंधर तक का प्रेरणादायी सांगीतिक सफर — पीएच.डी. के साथ 15 से अधिक शोध-पत्र राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित। बेगूसराय की मिट्टी से शुरू हुई संगीत साधना की यात्रा
संजीत श्रीवास्तव और सोनल गर्ग की रिपोर्ट
बेगूसराय / मथुरा / भागलपुर / बनारस। 24 अगस्त 2026। नेशनल पॉजिटिव न्यूज़
बिहार की सांस्कृतिक और संगीत-समृद्ध धरती ने समय-समय पर देश को अनेक प्रतिभाशाली कलाकार और विद्वान दिए हैं। इसी गौरवशाली परंपरा की एक उल्लेखनीय कड़ी हैं बेगूसराय की बेटी रश्मि शिखा, जिन्होंने संगीत साधना, शिक्षा, सांस्कृतिक गतिविधियों और शोध के क्षेत्र में निरंतर सक्रिय रहते हुए अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। और अब पीएचडी की डिग्री हासिल की। सर्वोदय नगर, बेगूसराय की रहने वाली रश्मि शिखा की सांगीतिक यात्रा बेगूसराय से शुरू होकर भागलपुर, मथुरा और बनारस की समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ते हुए पंजाब के जालंधर स्थित लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी तक पहुंची है। वर्ष 2026 में संगीत विषय में पीएचडी. पूर्ण करना उनकी वर्षों की साधना, अध्ययन और शोध का महत्वपूर्ण पड़ाव है।

पिता से मिले संगीत के संस्कार ने दिखाई राह: रश्मि शिखा के संगीत प्रेम की नींव उनके पारिवारिक संस्कारों में पड़ी। उनके पिता योगेश चंद मिश्रा और माता शोभा मिश्रा ने परिवार को आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक वातावरण दिया। उनके पिता बिहार सरकार के लघु सिंचाई विभाग में कार्यरत थे, लेकिन संगीत के प्रति उनका लगाव भी उतना ही गहरा था। वे अपने समय के प्रसिद्ध गायक रहे और उनका संबंध भागलपुर की उस सांगीतिक परंपरा से था, जिसमें परिवार की पीढ़ियों से गायन-वादन की परंपरा चली आ रही थी। नौकरी के सिलसिले में जब वे बेगूसराय आए तो यही शहर आगे चलकर परिवार की कर्मभूमि बन गया। पिता की संगीत साधना और घर के आध्यात्मिक वातावरण ने रश्मि शिखा के मन में बचपन से ही संगीत के प्रति गहरा अनुराग पैदा किया।
पढ़ाई के साथ संगीत और कथक की साधना: रश्मि शिखा ने वर्ष 2002 में ओमर बालिका उच्च विद्यालय, विष्णुपुर, बेगूसराय से दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद वर्ष 2004 में श्रीकृष्ण महिला महाविद्यालय, बेगूसराय से बारहवीं की शिक्षा पूरी की। संगीत के प्रति उनकी रुचि इतनी गहरी थी कि उन्होंने उच्च शिक्षा में भी इसी विषय को अपना क्षेत्र बनाया और वर्ष 2007 में संगीत विषय में ऑनर्स की उपाधि प्राप्त की। संगीत के साथ-साथ उन्होंने भारतीय शास्त्रीय नृत्य, विशेष रूप से कथक की भी साधना की। बेगूसराय के प्रसिद्ध कथक गुरु सुदामा गोस्वामी की शिष्या के रूप में उन्होंने कथक और भारतीय शास्त्रीय नृत्य का प्रशिक्षण प्राप्त किया। कम उम्र से ही वे जिले में आयोजित विभिन्न सांस्कृतिक, संगीत एवं नृत्य कार्यक्रमों में सक्रिय रूप से भाग लेती रहीं।

भागलपुर ने संगीत अध्ययन को दी नई दिशा: संगीत के प्रति बढ़ती रुचि उन्हें उच्च शिक्षा के लिए तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय तक ले गई। वर्ष 2010 में उन्होंने संगीत विषय में एम.ए. की डिग्री प्राप्त की। भागलपुर की समृद्ध सांगीतिक परंपरा और विश्वविद्यालय के शैक्षणिक वातावरण ने उनके संगीत-बोध को और अधिक विकसित किया। इसी दौर में संगीत उनके लिए केवल मंच पर प्रस्तुति देने की कला नहीं रहा, बल्कि अध्ययन, चिंतन और शोध का गंभीर विषय बनता गया।
केंद्रीय विद्यालय में संगीत शिक्षिका के रूप में सेवा: उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद रश्मि शिखा ने संगीत शिक्षा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। वर्ष 2013 से 2017 तक वे केंद्रीय विद्यालय, मथुरा रिफाइनरी नगर में संगीत शिक्षिका के रूप में कार्यरत रहीं। शिक्षिका के रूप में उन्होंने विद्यार्थियों को संगीत की शिक्षा देने के साथ भारतीय संगीत एवं सांस्कृतिक परंपराओं के प्रति उनमें रुचि पैदा करने का प्रयास किया। संगीत को स्वयं साधने के साथ नई पीढ़ी तक पहुंचाने का यह अनुभव उनके जीवन का महत्वपूर्ण अध्याय बना।
मथुरा में सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़ाव: विवाह के बाद रश्मि शिखा का जीवन मथुरा से जुड़ा। मथुरा की आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक भूमि ने उनकी सांगीतिक यात्रा को नया विस्तार दिया। उन्होंने संस्कार भारती में मंत्री के रूप में भी सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके साथ ही वे आकाशवाणी मथुरा की बी-ग्रेड लोक गायिका के रूप में भी अपनी पहचान बना चुकी हैं। लोक संगीत से उनका जुड़ाव उनकी सांगीतिक यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा और इससे उन्हें भारतीय लोक परंपराओं को करीब से समझने का अवसर मिला।

बनारस की संगीत परंपरा से जुड़ा पीएच.डी. शोध: रश्मि शिखा की सांगीतिक यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव बनारस की महान संगीत परंपरा से उनका अकादमिक जुड़ाव रहा। उन्होंने लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी, जालंधर, पंजाब से संगीत विषय में पीएचडी. का शोधकार्य किया।उनके शोध का केंद्र पद्मभूषण पंडित छन्नूलाल मिश्र के सांगीतिक योगदान पर रहा। वर्ष 2026 में उन्होंने संगीत विषय में अपनी पीएच.डी. पूर्ण की। यह उपलब्धि उनके लिए महज एक शैक्षणिक डिग्री नहीं, बल्कि वर्षों की संगीत साधना, अध्ययन, गुरुजनों से प्राप्त ज्ञान और भारतीय संगीत परंपरा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का परिणाम है।

शोध में मिला विद्वानों और संगीत परिवार का मार्गदर्शन: पीएचडी. के शोधकार्य के दौरान रश्मि शिखा को पंडित छन्नूलाल मिश्र के परिवार और उनकी संगीत परंपरा से जुड़े विद्वानों का महत्वपूर्ण सहयोग मिला। विशेष रूप से नमता मिश्रा, पंडित छन्नूलाल मिश्र के परम शिष्य इंद्रेश मिश्रा तथा उनकी शोध-निर्देशक डॉ. प्रतिभा शर्मा के मार्गदर्शन ने शोध को दिशा और गहराई प्रदान की। इसके अलावा संगीत जगत से जुड़े अनेक प्रतिष्ठित गुरुओं एवं विद्वानों का सहयोग भी उन्हें प्राप्त हुआ। इस मार्गदर्शन ने उनके शोध को केवल अकादमिक अध्ययन तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे भारतीय संगीत की परंपरा, गुरु-शिष्य संबंध और सांगीतिक विरासत से जोड़ने में मदद की।
15 से अधिक शोध-पत्र राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित: रश्मि शिखा की उपलब्धि केवल पीएचडी. की उपाधि तक सीमित नहीं है। संगीत के क्षेत्र में उनकी शोध-सक्रियता का प्रमाण उनके 15 से अधिक शोध-पत्रों का राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित होना भी है। विभिन्न शोध विषयों के माध्यम से उन्होंने संगीत, सांस्कृतिक परंपराओं और भारतीय संगीत की विविध धाराओं से जुड़े विषयों पर अपने अध्ययन एवं शोध दृष्टिकोण को अकादमिक जगत के सामने रखा है। उनकी यह यात्रा बताती है कि उन्होंने संगीत को केवल मंचीय प्रस्तुति की कला नहीं माना, बल्कि उसे गंभीर अध्ययन, चिंतन और शोध का विषय भी बनाया।
रश्मि शिखा का लक्ष्य—संगीत की कठिन राह को आसान बनाना: पीएचडी. के दौरान अपने अनुभवों को साझा करते हुए रश्मि शिखा कहती हैं कि सामान्य लोगों के लिए संगीत के क्षेत्र में विशेष चीज हासिल करना आज भी आसान नहीं है। कई परंपरागत व्यवस्थाओं और घराना-आधारित ज्ञान की वजह से संगीत की बारीकियां आम लोगों की पहुंच से दूर रह जाती हैं। उनका कहना है कि बच्चों और शोधार्थियों को सही जानकारी और सही परंपरा तक पहुंचने के लिए काफी प्रयास करना पड़ता है। इसलिए अब उनका प्रयास है कि जिस कठिनाई का सामना उन्होंने स्वयं किया, उसे आने वाली पीढ़ी के लिए आसान बनाया जाए।

गुरुजनों से मिली शिक्षा को लिखित रूप में संरक्षित करने की पहल: रश्मि शिखा के अनुसार, उन्हें अपने गुरुजनों, घरानों और विभिन्न कलाकारों से जो ज्ञान और शिक्षा प्राप्त हुई है, उसे लिखित रूप में संगीत जगत तक पहुंचाना उनकी प्राथमिकताओं में शामिल है।
बिहार के लोक संगीत और कलाकारों को राष्ट्रीय पहचान दिलाने का संकल्प: रश्मि शिखा का सपना केवल शास्त्रीय संगीत के अध्ययन तक सीमित नहीं है। वे बिहार की लोक परंपराओं और यहां के कलाकारों को भी राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाना चाहती हैं। उनका मानना है कि बिहार की लोक संगीत परंपरा और यहां के कलाकारों की प्रतिभा को लंबे समय से अपेक्षित स्थान नहीं मिला है। वे बिहार की लोक परंपराओं, कलाकारों और उनकी सांगीतिक विशेषताओं को देश के सामने लाना चाहती हैं।उनके अनुसार बिहार के कलाकारों में भी वही प्रतिभा और सांगीतिक गुण मौजूद हैं, जो देश के दूसरे हिस्सों के कलाकारों में दिखाई देते हैं। जरूरत केवल उन्हें उचित मंच और पहचान देने की है।

बिहार के प्रति बनी धारणा को बदलना चाहती हैं रश्मि शिखा: रश्मि शिखा ने बिहार से बाहर काम करने के अपने अनुभवों का उल्लेख करते हुए कहा कि कई बार किसी व्यक्ति की पहचान उसके काम से पहले उसके क्षेत्र के आधार पर बनाई जाती है। उन्होंने महसूस किया कि जब लोग यह जानते हैं कि कोई व्यक्ति बिहार से है तो शुरुआत में उनका नजरिया अलग हो सकता है।लेकिन जब वही व्यक्ति अपने काम से अपनी क्षमता साबित करता है और बेहतर प्रदर्शन करता है तो लोगों की सोच बदलने लगती है। रश्मि शिखा इसी धारणा को बदलना चाहती हैं। उनका कहना है कि बिहार के प्रति दूसरे क्षेत्रों में विकसित हुई पूर्वधारणाओं की इस सीमा को तोड़ना जरूरी है, ताकि आने वाली पीढ़ी के बच्चों को सकारात्मक सोच और बेहतर अवसर मिल सकें।
बेगूसराय से जालंधर तक उपलब्धियों का सफर: रश्मि शिखा की उपलब्धियों की यात्रा को देखा जाए तो वर्ष 2000 में दसवीं, 2004 में बारहवीं, 2007 में संगीत में ऑनर्स, 2010 में संगीत में एम.ए., 2013 से 2017 तक केंद्रीय विद्यालय में संगीत शिक्षिका के रूप में सेवा और 2026 में संगीत विषय में पीएच.डी. की पूर्णता तक उनका सफर निरंतर अध्ययन और साधना का प्रमाण है। इस यात्रा में बेगूसराय की मिट्टी के संस्कार, भागलपुर की उच्च शिक्षा, मथुरा का सांस्कृतिक वातावरण, बनारस की महान संगीत परंपरा और पंजाब में उच्च स्तरीय शोध—सभी ने उनके व्यक्तित्व को समृद्ध किया। उनकी उपलब्धि यह संदेश देती है कि जब प्रतिभा को संस्कारों की जड़ें, गुरुजनों का मार्गदर्शन और मेहनत के पंख मिलते हैं, तो सफलता की उड़ान की कोई सीमा नहीं होती।






Total views : 101644











