बेगूसराय, 18 मार्च 2026 | नेशनल पॉजिटिव न्यूज़
गणेशदत्त महाविद्यालय बेगूसराय के स्नातकोत्तर प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग द्वारा विज्ञान भवन सभागार में प्रो. राधाकृष्ण चौधरी स्मृति व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रधानाचार्य प्रो. भूपेन्द्र नारायण ने की। इस दौरान विभागाध्यक्ष डॉ. अनिल कुमार और डॉ. अमिय कृष्ण ने अतिथियों का स्वागत किया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में शिक्षाविद्, छात्र और गणमान्य लोग उपस्थित रहे।
प्रो. चौधरी के व्यक्तित्व को किया गया याद: वक्ता प्रो. फुलेश्वर प्रसाद सिंह ने कहा कि वे न केवल एक उत्कृष्ट शिक्षक थे, बल्कि अनुशासन और शिक्षा के प्रति समर्पण का प्रतीक भी थे।उन्होंने बताया कि गरीब और मेधावी छात्रों के लिए उनका दरवाजा हमेशा खुला रहता था। उनके अध्यापन का प्रभाव पूरे महाविद्यालय के शैक्षणिक स्तर पर देखने को मिलता था।

मुख्य वक्ता ने बताया ‘द मैन विद मिशन’: मुख्य वक्ता इतिहासविद एवं पूर्व पुलिस महानिरीक्षक उमेश कुमार सिंह ने प्रो. चौधरी को “द मैन विद मिशन” बताते हुए उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि प्रो. चौधरी की अध्ययनशीलता और शोध के प्रति लगन ने छात्रों को जीवनभर सीखने की प्रेरणा दी।
तीन दशक तक दी शैक्षणिक सेवा: प्रो. राधाकृष्ण चौधरी ने वर्ष 1946 में महाविद्यालय में इतिहास के व्याख्याता के रूप में योगदान दिया। वर्ष 1954 में वे प्राचीन भारतीय इतिहास एवं संस्कृति विभाग के अध्यक्ष बने और 1974 तक सेवा देते रहे।करीब तीन दशकों के कार्यकाल में उन्होंने महाविद्यालय को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। उनके कारण बेगूसराय और गणेशदत्त महाविद्यालय का नाम देशभर में प्रसिद्ध हुआ।

पुरातत्व और इतिहास में अहम योगदान: प्रो. चौधरी को आर. ई. एम. व्हीलर के नेतृत्व में हड़प्पा और मोहनजोदड़ो उत्खनन में शामिल होने का अवसर मिला। साथ ही ए. एस. अल्तेकर के नेतृत्व में कुम्हरार खुदाई में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने बेगूसराय के जयमंगला गढ़ सहित कई स्थानीय स्थलों का पहला पुरातात्विक अध्ययन किया और उन्हें राष्ट्रीय पहचान दिलाई।
सामाजिक सरोकारों से भी जुड़े रहे: प्रो. चौधरी स्वतंत्रता संग्राम, किसान आंदोलन और सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रिय रहे। वे स्वामी सहजानंद सरस्वती और राहुल सांकृत्यायन जैसे महान व्यक्तित्वों के संपर्क में रहे। 1943 के बंगाल अकाल के दौरान उन्होंने छात्रों के साथ राहत कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
विद्वानों ने बताया इतिहास लेखन की नई धारा: कार्यक्रम में पटना विश्वविद्यालय के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. ओ.पी. जायसवाल ने ऑनलाइन संबोधन में कहा कि प्रो. चौधरी के इतिहास ज्ञान को डी. डी. कोसांबी जैसे विद्वानों ने भी सम्मान दिया। समाजशास्त्री प्रसन्न चौधरी ने कहा कि प्रो. चौधरी ने उन लोगों का इतिहास लिखने की पहल की, जिनकी आवाज अब तक दबाई गई थी।
परिवार की उपस्थिति रही आकर्षण: कार्यक्रम का विशेष आकर्षण प्रो. चौधरी के परिवार की उपस्थिति रही, जिसमें उनके पुत्र प्रभात कुमार चौधरी, प्रसन्न चौधरी, प्रणव कुमार चौधरी और अनुपम कुमार शामिल हुए। अंत में अध्यक्षीय भाषण डॉ. शशिकांत पांडेय ने दिया, जबकि संचालन डॉ. कुंदन कुमार और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. अमिय कृष्ण ने किया।






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