बेगूसराय। महिला समानता केवल महिलाओं को अधिकार देने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके लिए परिवार, समाज और सरकार—तीनों स्तरों पर सोच और व्यवहार में बदलाव जरूरी है। बच्चों में बचपन से ही समानता, सम्मान और सकारात्मक लैंगिक दृष्टिकोण विकसित किया जाए, ताकि वे बड़े होकर किसी भी प्रकार के लैंगिक भेदभाव और रूढ़िवादी सोच से मुक्त समाज के निर्माण में योगदान दे सकें।
श्री कृष्ण महिला महाविद्यालय, बेगूसराय की मनोविज्ञान प्राध्यापक संगीता कुमारी ने महिला समानता के विषय पर अपनी राय रखते हुए कहा कि परिवार बच्चों के पालन-पोषण के दौरान बेटा-बेटी के बीच भेदभाव न करे और दोनों को समान अवसर एवं सम्मान दे। वहीं समाज को रूढ़िवादी लैंगिक धारणाओं को कम करते हुए महिलाओं के आत्मसम्मान, आत्मविश्वास और निर्णय लेने की क्षमता को प्रोत्साहित करना चाहिए।उन्होंने कहा कि सरकार की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। ऐसी शिक्षा व्यवस्था और नीतियां विकसित की जानी चाहिए, जो मानसिक सशक्तिकरण, समान अवसर और भेदभाव-मुक्त वातावरण सुनिश्चित करें। महिला समानता के लिए केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे समाज के व्यवहार और सोच में भी उतारना जरूरी है ।
संगीता कुमारी ने कहा कि महिलाओं को बचपन से ही यह समझना चाहिए कि वे महत्वपूर्ण हैं और अपने जीवन में आगे बढ़ने की पूरी क्षमता रखती हैं। महिलाओं को अपने आत्मसम्मान, अधिकारों और निर्णय लेने की क्षमता को पहचानना होगा। जब परिवार बच्चों को समानता सिखाएगा, समाज महिलाओं को सम्मान और अवसर देगा तथा सरकार प्रभावी नीतियां लागू करेगी, तभी वास्तविक महिला समानता का लक्ष्य हासिल किया जा सकेगा।





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