बेगूसराय, 07 मई 2026 | नेशनल पॉजिटिव न्यूज़
बेगूसराय संग्रहालय में आयोजित पांच दिवसीय मूर्तिकला (टेराकोटा) कार्यशाला के तीसरे दिन छात्र-छात्राओं की रचनात्मक प्रतिभा खुलकर सामने आने लगी। बच्चों ने अपनी कल्पनाशीलता और कलात्मक कौशल का परिचय देते हुए मिट्टी के साधारण पिंड को आकर्षक आकृतियों में ढालना शुरू कर दिया है। कार्यशाला में प्रतिभागी प्रशिक्षक कलाकार मनीष कौशिक के मार्गदर्शन में भगवान, पशु-पक्षी एवं मानव आकृतियों को गढ़ने की कला सीख रहे हैं। बच्चों के उत्साह, धैर्य और समर्पण ने आयोजन को खास बना दिया है।
कला सीखने के साथ बढ़ रहा आत्मविश्वास: कार्यशाला में शामिल छात्र-छात्राएं मिट्टी के माध्यम से अपनी भावनाओं और कल्पनाओं को आकार दे रहे हैं। प्रशिक्षण के दौरान बच्चों को मूर्तिकला की बारीकियों, डिजाइन और संरचना के बारे में विस्तार से जानकारी दी जा रही है। कला एवं संस्कृति पदाधिकारी श्याम कुमार सहनी ने प्रतिभागियों की सक्रियता की सराहना करते हुए कहा कि मूर्तिकला धैर्य, मेहनत और सूक्ष्मता की कला है। उन्होंने कहा कि मिट्टी की मूर्तियों का सबसे बड़ा आकर्षण उनका प्राकृतिक स्वरूप होता है और यही इसकी सबसे सुंदर विशेषता है।
44 छात्र-छात्राएं ले रहे हिस्सा: 5 मई से 9 मई तक आयोजित इस विशेष कार्यशाला में जिले के विभिन्न विद्यालयों के कुल 44 छात्र-छात्राएं भाग ले रहे हैं। मिट्टी से जुड़कर कुछ नया सृजित करने का उत्साह बच्चों में साफ दिखाई दे रहा है।इस अवसर पर वरिष्ठ चित्रकार एवं प्रशिक्षक इन्द्रमोहन प्रसाद तथा कला लेखक सुमन कुमार सिंह भी मौजूद रहे और प्रतिभागियों का मार्गदर्शन किया।

स्थानीय स्तर पर कला चेतना बढ़ाने का प्रयास: बिहार भ्रमण पर आए वरिष्ठ कलाकार एवं कला लेखक सुमन कुमार सिंह ने कहा कि ऐसे छोटे-छोटे प्रयास समाज में कला चेतना को जागृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने कहा कि महानगरों के बड़े आयोजनों की तुलना में स्थानीय स्तर पर ललित कला के प्रति बढ़ती सक्रियता अधिक प्रेरणादायक और सार्थक है। उन्होंने कहा कि इस तरह की कार्यशालाएं बच्चों में रचनात्मक सोच विकसित करने के साथ-साथ भारतीय पारंपरिक कला के प्रति लगाव भी बढ़ाती हैं।

संस्कृति संरक्षण की दिशा में सकारात्मक पहल: बेगूसराय संग्रहालय में आयोजित यह कार्यशाला न केवल बच्चों की प्रतिभा को मंच दे रही है, बल्कि पारंपरिक टेराकोटा कला को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का भी महत्वपूर्ण माध्यम बन रही है। कला प्रेमियों का मानना है कि ऐसे आयोजन स्थानीय संस्कृति और रचनात्मकता को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाते हैं।






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