बेगूसराय |3 अप्रैल 2026। नेशनल पॉजिटिव न्यूज़
हिंदी रंगमंच दिवस के अवसर पर जन संस्कृति मंच (जसम) बेगूसराय द्वारा कमलेश्वरी भवन (माले कार्यालय) में एक विचार गोष्ठी सह बैठकी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में जिले के कई रंगकर्मी और रंगप्रेमियों ने भाग लिया। चर्चा का मुख्य विषय रहा — “रंगमंच की प्राथमिकता और बदलता परिवेश”।
रंगमंच की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर चर्चा: जसम के जिला कार्यकारी सचिव पंकज कुमार सिन्हा ने बताया कि इसी दिन पंडित शीतला प्रसाद ने पहला हिंदी नाटक “जानकी मंगल” लिखा था, जिसमें भारतेंदु हरिश्चंद्र ने लक्ष्मण की भूमिका निभाई थी। तभी से इस दिन को हिंदी रंगमंच दिवस के रूप में मनाया जाता है। वरिष्ठ रंगनिर्देशक अरविंद कुमार सिन्हा ने कहा कि रंगमंच हमेशा सामाजिक मुद्दों की अभिव्यक्ति और हिंदी साहित्य के प्रचार-प्रसार का सशक्त माध्यम रहा है। उन्होंने बताया कि बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और राजस्थान जैसे राज्यों में इस दिन विविध सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
अनुदान, व्यावसायिकता और रंगमंच की दिशा: वरिष्ठ रंगकर्मी दीपक सिन्हा ने 1967 में आचार्य रामचंद्र शुक्ल द्वारा “हिंदी साहित्य का इतिहास” में इस नाटक के मंचन को प्रमाणित किए जाने का उल्लेख किया। वहीं अनिल पतंग ने कहा कि रंगमंच की प्राथमिकता हमेशा बनी रहेगी और यह बिना सरकारी अनुदान के भी जीवित रह सकता है। उन्होंने जट-जटिन, सामा चकैवा, घासीराम कोतवाल और गगन दमामा बाज्यो जैसे नाटकों का उदाहरण देते हुए कहा कि ये रचनाएं बिना अनुदान के भी सफल रही हैं। चर्चा में शामिल प्रतिभागियों ने कहा कि अनुदान के कारण रंगमंच में व्यावसायिकता बढ़ रही है, जिससे कलाकारों की गुणवत्ता और समर्पण प्रभावित हो रहा है।
सत्ता, समाज और रंगमंच की भूमिका: नवतरंग के तारानंद वियोगी ने भरतमुनि के नाट्यशास्त्र का पाठ प्रस्तुत किया। युवा रंगकर्मी गुंजेश ने कहा कि रंगमंच को सत्ता के विरुद्ध खड़े होकर समाज के ज्वलंत मुद्दों को उठाना चाहिए।संतोष राही ने स्पष्ट किया कि रंगमंच सत्तापोषित नहीं है, जबकि चंदन वत्स ने कहा कि रंगमंच अपनी ताकत पर खड़ा है और समाज को नफरत की राजनीति से ऊपर उठना होगा।
प्रेम, शांति और प्रतिरोध का माध्यम है रंगमंच: कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ रंगकर्मी विजय कुमार सिन्हा ने की, जबकि संचालन करते हुए दीपक सिन्हा ने कहा कि रंगमंच की अंतर्वस्तु में प्रतिरोध निहित है, इसलिए सत्ता को यह सहज नहीं लगता। चंद्रदेव वर्मा ने कहा, “युद्ध रक्तयुक्त राजनीति है और राजनीति रक्तविहीन युद्ध”, ऐसे में रंगकर्मियों को इसी दृष्टिकोण से समाज में अपनी भूमिका तय करनी होगी। राजेश श्रीवास्तव ने नुक्कड़ नाटकों को जनजागरूकता का प्रभावी माध्यम बताया।
अनेक रंगकर्मियों की रही सहभागिता: बैठकी में मिथिलेश कांति, चंद्रभूषण भारती, मनोज कुमार, कन्हैया, नीलेश झा, मोहम्मद अकरम, कौशल पंडित, आशा देवी, संजय ठाकुर सहित कई रंगकर्मी उपस्थित रहे। अंत में राजाराम आर्य ने सभी आगंतुकों का धन्यवाद ज्ञापित किया।






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